सोना-चांदी के बाज़ार में भूचाल, रिकॉर्ड गिरावट के तीन बड़े कारण और आगे की राह विस्तार मे जानिए
निवेशकों में डर और अस्थिरता का माहौल पिछले कुछ समय से वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ती मुद्रास्फीति के कारण सोना और चांदी लगातार रिकॉर्ड स्तरों को छू रहे थे। निवेशक इन धातुओं को ‘सुरक्षित निवेश’ (Safe-Haven) के रूप में देख रहे थे। लेकिन 23 नवंबर 2025 को कमोडिटी बाज़ार में एक अप्रत्याशित घटनाक्रम देखने को मिला, जब इन दोनों कीमती धातुओं की कीमतों में अचानक भारी गिरावट दर्ज की गई। MCX (मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज) पर सोने के वायदा भाव में लगभग ₹976 प्रति 10 ग्राम और चांदी के वायदा भाव में ₹1400 से अधिक की गिरावट ने निवेशकों के बीच भय का माहौल पैदा कर दिया। यह गिरावट कोई साधारण उतार-चढ़ाव नहीं थी, बल्कि तीन शक्तिशाली वैश्विक आर्थिक कारकों का सीधा परिणाम थी। इन कारणों को समझना बाज़ार की आगामी दिशा को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सोना और चांदी, जो सदियों से धन और सुरक्षा का प्रतीक रहे हैं, जब एक साथ इतनी बड़ी गिरावट देखते हैं, तो इसका असर केवल वायदा बाज़ार तक सीमित नहीं रहता। इस गिरावट ने लाखों खुदरा निवेशकों को चौंका दिया, जो दिवाली और त्योहारी सीज़न के बाद सोने को एक सुरक्षित संपत्ति मानकर खरीद रहे थे। यह गिरावट अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार (COMEX) और घरेलू बाज़ार (MCX) दोनों में दिखाई दी, जो दर्शाता है कि यह किसी स्थानीय कारक के बजाय एक बड़ा वैश्विक रुझान था। रिकॉर्ड ऊँचाइयों से तेज़ी से नीचे आना निवेशकों के आत्मविश्वास को हिला देता है और अधिक बिकवाली को प्रोत्साहित करता है।
1 . पहला मुख्य कारण :
अमेरिकी ब्याज दरों पर ‘हॉकिश’ रुख सोने की कीमतों को प्रभावित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक अमेरिकी केंद्रीय बैंक ( फेडरल रिज़र्व ) द्वारा निर्धारित ब्याज दरें हैं। सोना एक ऐसी संपत्ति है जिस पर कोई ब्याज या लाभांश नहीं मिलता है ( जिसे ‘गैर-उपज वाली संपत्ति’ या Non-Yielding Asset कहते हैं )। जब फेडरल रिज़र्व ब्याज दरें बढ़ाता है, तो सरकारी बॉन्ड और बैंक जमा जैसी ब्याज देने वाली संपत्तियाँ अधिक आकर्षक हो जाती हैं। निवेशक सोने से पैसा निकालकर इन ब्याज वाली संपत्तियों में लगाते हैं, जिससे सोने की मांग और कीमत घट जाती है। हाल ही में, फेडरल रिज़र्व के अधिकारियों ने ऐसे कठोर बयान दिए हैं जो संकेत देते हैं कि ब्याज दरें ‘अधिक समय तक ऊँची’ (Higher for Longer) बनी रहेंगी। ब्याज दर में कटौती की उम्मीद कम होने से बॉन्ड यील्ड में तेज़ी आई है। इससे सोना रखने की अवसर लागत (Opportunity Cost) बढ़ जाती है, क्योंकि निवेशक को बॉन्ड से मिलने वाले ऊंचे रिटर्न का नुकसान होता है। इस उम्मीद ने सोने से बड़े पैमाने पर पैसा निकालने को मजबूर किया।
संक्षेप में, बाज़ार की यह बदलती अपेक्षा कि अमेरिकी फेडरल रिज़र्व जल्द ही दरों में कटौती नहीं करेगा, ने सोने के आकर्षण को कम कर दिया और कीमतों में भारी दबाव बनाया।
2 . दूसरा मुख्य कारण :
डॉलर की मज़बूती और कमोडिटी पर दबाव सोने की कीमतों में गिरावट का दूसरा सबसे शक्तिशाली कारण अमेरिकी डॉलर की मज़बूती है। डॉलर और सोने का विपरीत रिश्ता चूंकि सोना और चांदी जैसी कमोडिटीज़ का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर में होता है, इसलिए दोनों के बीच आमतौर पर एक विपरीत संबंध होता है। जब डॉलर मज़बूत होता है ( यानी डॉलर इंडेक्स DXY ऊपर जाता है ), तो यूरो, येन या भारतीय रुपये जैसी अन्य मुद्राएं कमजोर हो जाती हैं। इसका अर्थ यह है कि इन मुद्राओं वाले खरीदारों के लिए सोना खरीदने की लागत बढ़ जाती है। खरीद लागत बढ़ने के कारण अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में सोने की मांग घट जाती है, जिससे इसकी कीमतों पर सीधा दबाव पड़ता है और गिरावट आती है।
हाल के दिनों में, अमेरिकी अर्थव्यवस्था से आए मजबूत डेटा ( जैसे मजबूत रोज़गार संख्या ) ने फेड को आक्रामक रुख बनाए रखने का समर्थन किया है, जिससे डॉलर इंडेक्स (DXY) मज़बूत हुआ है। डॉलर की यह मज़बूती सीधे तौर पर सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट का कारण बनी।
3 . तीसरा मुख्य कारण :
रिकॉर्ड ऊँचाइयों पर मुनाफावसूली और ETF से निकासी गिरावट का तीसरा कारण बाज़ार की स्वाभाविक गतिशीलता से जुड़ा है – निवेशकों द्वारा लाभ बुक करना। सोने और चांदी ने हाल ही में वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच रिकॉर्ड ऊँचाइयों को छुआ था। जब कोई संपत्ति अपने चरम मूल्य पर पहुँचती है, तो संस्थागत निवेशक ( जैसे हेज फंड और बड़े बैंक ) लाभ सुनिश्चित करने के लिए उसे बेच देते हैं। इसी प्रक्रिया को मुनाफावसूली कहा जाता है। जब एक साथ कई बड़े निवेशक बिकवाली शुरू करते हैं, तो बाज़ार में आपूर्ति बढ़ जाती है और भारी बिकवाली का दबाव बनता है, जिससे कीमतों में तेज़ गिरावट आती है। गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) सोने में निवेश का एक लोकप्रिय माध्यम है। ये फंड वास्तविक सोना रखते हैं। हाल ही बाज़ार के रुझानों में यह देखा गया है कि निवेशकों ने बड़े पैमाने पर गोल्ड ETF से अपनी हिस्सेदारी बेची है। जब निवेशक ETF बेचते हैं, तो फंड को भी अपना सोना बेचना पड़ता है, जिससे भौतिक सोने की मांग कम हो जाती है और कीमतें नीचे आती हैं। यह संस्थागत निकासी कीमतों पर दबाव बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
4 . भारतीय बाज़ार पर प्रभाव और भविष्य की दिशा :
सोने-चांदी की कीमतों में इस गिरावट का भारतीय अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं पर सीधा असर पड़ता है, खासकर त्योहारी सीज़न के बाद। भारतीय खरीदारों के लिए, जो अक्सर रुपये के कमजोर होने के कारण ऊँची कीमत चुकाते हैं, यह गिरावट एक स्वागत योग्य राहत थी। विवाह और निवेश के उद्देश्यों से खरीदारी करने वालों को कम दामों पर सोना खरीदने का मौका मिला। विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट लंबी अवधि के निवेशकों के लिए खरीदने का अवसर हो सकती है। वैश्विक अनिश्चितताएं ( जैसे यूक्रेन संघर्ष या मध्य पूर्व में तनाव ) अभी भी मौजूद हैं, जो सोने को एक मजबूत सुरक्षित निवेश बनाए रखेंगी। इस गिरावट को मुख्य रूप से एक तकनीकी सुधार (Technical Correction) माना जा रहा है। कीमतें लगातार ऊपर नहीं जा सकतीं, और रिकॉर्ड ऊंचाई के बाद बाज़ार का इस तरह से प्रतिक्रिया देना स्वाभाविक है।
सोना और चांदी की कीमतों में आई यह भारी गिरावट अमेरिकी मौद्रिक नीति, डॉलर की चाल और तकनीकी मुनाफावसूली के एक साथ जुड़ने का परिणाम है। हालांकि अल्पावधि में बाज़ार में अस्थिरता बनी रहेगी, लेकिन दीर्घकालिक निवेशक अभी भी भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण इन कीमती धातुओं के प्रति सकारात्मक रुख बनाए हुए हैं।
